रामनवमी त्योहार पर साम्प्रदायिक हिंसा

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नई दिल्ली: रामनवमी के दिन मुल्क की कई रियासतों में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी और कई रियासतों में हालात अब भी नार्मल नहीं है. कुछ साल पहले तक साम्प्रदायिक हिंसा, आतिश ज़नी, तोड़ फोड़ जैसी ख़बरें समाज में ख़ौफ़ और घबराहट का माहौल पैदा करती थीं. लोग न सिर्फ अपने लिए बल्कि मुआशरे और मुल्क की हिफ़ाज़त के लिए परेशान रहते थे. लेकिन मुल्क को बदलने की जो नयी धुन लोगों में भर दी गयी है उसके बाद एहसास भी बदल गया है. अब धर्म की हिफ़ाज़त का सवाल इतना अहम् हो गया है कि इसके सामने ज़िंदा इंसानो की कोई क़दर नहीं है. इंसान ज़िंदा रहे या मरे, मज़हब को अमर रहना चाहिए. इसी सोच के साथ मुल्क आगे बढ़ रहा है. अब त्योहारों का मतलब खुशियां मनाना या बाटना नहीं बल्कि अपने मज़हब का परचम बुलंद करना है ताकि दूसरे मज़हब के लोगों को दहशतज़दा किया जा सके.

रामनवमी सदियों से मुल्क के बड़े हिस्सों में मनाई जाती रही है और इस में हिंसा के लिए कभी कोई जगह नहीं थी. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. रामनवमी या विजय दशमी के दिन हथियारों की नुमाइश होती है, जुलूस के बहाने सड़क पर अक्सीरियत में होने के घमंड का बेहूदा मुज़ाहिरा किया जाता है. दूसरे मज़ाहिब के मानने वालों को बड़ी चालाकी से ये पैग़ाम देने की कोशिश की जाती है कि वो इस मुल्क में दूसरे दर्जे के शहरी हैं. संविधान में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है, लेकिन अब एक नया सियासी संविधान तैयार किया जा रहा है जिसमें इस क़िस्म की सोच की हौसला अफ़ज़ाई की जा रही है. बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, झारखण्ड और गुजरात जैसी रियासतों से रामनवमी पर जो तस्वीरें और ख़बरें सामने आयी हैं वो परेशान करने वाली हैं.

रामनवमी के जुलूसों में लाठी, भाले लेकर चलना, जुलूस को जबरदस्ती दूसरों की इबादत की जगह के सामने से लेकर गुजारना, इमारतों पर भगवा रंग लगा देना, हनुमान जी का गुस्से वाला चेहरा, राम जी का गुस्से से तना हुआ पोस्टर लगाना और तेज आवाज में मज़हबी गाने बजाते हैं, ये सारी हरकतें किसी ज़ाविये से राम जी की अक़ीदतमंद वाली नजर नहीं आती. बल्कि इनके पीछे दूसरे मज़ाहिब के लोगों को तंग करने, उकसाने और हिंसा पर उकसाने की साज़िश नज़र आती है. हिंदू धर्म कभी संकीर्ण और अनुदार नहीं रहा है. अगर ऐसा होता तो हिन्दुस्तानी समाज में गंगा जमुनी सक़ाफ़त जैसी मिसालें पैदा न होतीं. हिंदुस्तानी सक़ाफ़त की खुसूसियत अनेकता में एकता है और इसका संविधान में बखूबी निभाया गया है. लेकिन अब इस खासियत को तंग नज़री से तोडा जा रहा है जो की तशवीशनाक है.

इस बार नवरात्रि और रमज़ान एक साथ आ गए, जो कि बहुत आम है. इससे पहले भी कई बार दोनों मज़ाहिब के त्योहारों की तारीखें आस-पास पड़ती रही हैं. ऐसे में समझदारी का मुज़ाहिरा करते हुए तक़रीबात का इनेक़ाद इस तरह किया गया है कि कोई किसी के लिए उलझन या रुकावट पैदा न कर सके. मुक़ामी इंतजामिया मज़हबी जुलूसों की इजाज़त देती हैं, जुलुस निकलने का रास्ता भी तय करती हैं, इस से अंदाज़ा लगाया जाता है कि जुलुस में कितने लोग शरीक हो सकते हैं. तमाम इम्कानात पर ग़ौर करने के बाद ही जुलुस को आगे बढ़ने की इजाज़त दी जाती है.

हिन्दुस्तान जैसे कसीर मज़हबी मुल्क में ये फ़ितरी बात है कि कोई भी मज़हबी जुलुस वहां से गुज़रे, वहां कोई और मज़हबी मुक़ाम ज़रूर हो, ऐसे पुलिस इंतजामिया की ज़िम्मेदारी है कि वो ऐसे रास्तों का मुतबादल तलाश करे या शहर व क़स्बा के ज़िम्मेदार अफ़राद पर मुश्तमिल कमिटी बना कर एक गाइड लाइन तैयार करें. तमाम समुदाय के लोगों को ऐतेमाद में लें और फिर मज़हबी जुलुस की इजाज़त दें.

पिछले साल हनुमान जयंती के मौके पर दिल्ली में जिस तरह से माहौल ख़राब हुआ था, इसके लिए एक दूसरे को सर पैट ठीकरा फोड़ा गया था. फसाद की शुरुआत कौन करता है और आखिर में कौन फंसता है, इस सवाल से ज़्यादा अहम् ये देखना है कि आखिर नुक्सान किसका होता है. फसादात की आग में हमेशा आम तब्क़ा, ग़रीब लोग, रोज़ कमाने खाने वाले सबसे ज़्यादा झुलसते हैं. औरतें और बच्चे मज़हब के नाम पर झगड़ों का निशाना बनते हैं. तक़सीम से लेकर दिल्ली के हालिया फसादात तक, हर बार कहानी एक जैसी रही है, सिर्फ किरदार और वजूहात बदली हैं. अफ़सोस का मुक़ाम है कि इतने ज़ख्म देखने के बावजूद मुआशरा संभल कर चलना नहीं सीख रहा है.

सियासतदां अपने मक़सद के लिए मज़हबी तक़रीबाट को फ़रोग़ देते हैं. मज़हब और ज़ात पात के नाम पर गिरोह बंदी वोट हासिल करने का सबसे आसान तरीक़ा है, क्योंकि इन मसाइल का बराह रास्त ताल्लुक़ जज़्बात से है और लोग इन में बह जाते हैं. लेकिन इस में लोगों की रोज़मर्राह ज़िन्दगी से जुड़े बहुत से अहम् मसाइल गुम हो जाते हैं. अगर मज़हबी वाक़्यात तशद्दुद की लकीर तक पहुँच जाये तो तक़सीम करो और हुकूमत करो का खेल खेलना आसान हो जाता है. भारत 75 साल पहले ऐसे ही तबाहकुन खेल का नुकसान देख चूका है. आह मुल्क फिर इसी बिसात का मोहरा बन चूका है. ये खेल तब ही रुकेगा जब मुआशरा इसे रोकेगा.

[नोट: उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एमसीएफ न्यूज़ इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]